
एक कहानी कुछ आपबीती कुछ जगबीती....
विश्व प्रसिद्ध नगरी बनारस के दक्षिणी किनारे गंगातट पर मेरा जन्म हुआ, गंगाजी की कल-कल करती पावन नीले जल और उपर नीले आसमां ने पूरी दुनिया घूमने का शौक पैदा कर दिया, शुरु किया चारों तीर्थ और द्वादश ज्योतिर्लिंग से। चारों तीर्थ तो अध्यापन काल में ही पूरे हो गए। द्वादश ज्योतिर्लिंग का सपना दिनांक 19 जून, 2010 को देवघर स्थित बाबा बैजनाथ जी के दर्शन से हुआ। बाबा विश्वनाथ (बनारस) का मंदिर तो मेरे पुश्तैनी घर से महज 10 किलोमीटर की दूरी पर है।
आने वाले दिनों में भारत के हर अंचल में आपको अपने साथ ले चलूँगा। आज श्रीगणेश करते हुए आपको बाबा बैजनाथ धाम की कथा बताता हूँ :
कथा ज्योतिर्लिंग महादेव की
ज्योतिर्लिंग शब्द महादेव का ही पर्याय है। पुराणों में, विशेषत: 'शिवपुराण' में कथा है कि विष्णु की नाभि से जब ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई, तब वह बहुत व्यग्र हो उठे। विष्णु ने उनकी व्यग्रता देख कर कहा कि आप व्यर्थ व्यग्र हो रहे हैं। आप तो सृष्टि-विस्तार के लिए ही उत्पन्न किए गए हैं। विष्णु की यह बात ब्रह्मा को लग गई। वह अहंकारवश अपने को विष्णु से बड़ा मानने की महत्वाकांक्षा रखते थे, फलत: विष्णु से लड़ने को तैयार हो गए। इन दोनों के विवाद के निर्णयार्थ एक विराट ज्योतिर्लिंग (ज्योतिर्मय लिंग) प्रकट हुआ, जिसके चारों ओर भयंकर ज्वाला फैल रही थी। इसके आदि मध्य और अन्त का कोई पता नहीं था।
ब्रह्मा और विष्णु के लिए यह शर्त रखी गई कि जो इस विराट लिंग के ओर-छोर का पता करने में समर्थ होगा, वही बड़ा माना जाएगा। दोनों शर्त के अनुसार पता लगाने को निकल पड़े। जब दोनों लौटकर आये, तब ब्रह्मा झूठ बोल गए कि उनको इस ज्योतिर्लिंग के आदि-अन्त का पता मालूम हो गया है। इस बात की सत्यता के सन्दर्भ में केतकी पुष्प (केवड़ा) ने ब्रह्मा की ओर से झूठी गवाही दी। इसीलिए केतकी पुष्प का शिवलिंग पर अर्पण निषिद्ध हो गया है। परन्तु विष्णु ने सच-सच कहा कि वह ज्योतिर्लिंग के आदि-अन्त का पता नहीं पा सके। अत: निर्णय हुआ कि विष्णु ही ब्रह्मा से बड़े देवता हैं।
भारत में शिव के बारह ज्योतिर्लिंग या प्रधान लिंग प्रतिष्ठित हैं, जो 'द्वादश ज्योतिर्लिंग' के नाम से प्राख्यात हैं। ये हैं-सौराष्ट्र (सूरत, गुजरात) में सोमनार्थ, श्रीशैल पर्वत पर मल्लिकार्जुन, उज्जयिनी में महाकाल, नर्मदा-तट पर अमरेश्वर में ओंकारेश्वर, हिमालय पर केदारनाथ, डाकिनी-पिशाचिनी के समाज में भीमशंकर, काशी में विशेश्वर, गोमती-तट पर त्र्यम्बकेश्वर, चिताभूमि में वैद्यनाथ, दारुका-वन में नागेश्वर, सेतुबंध में रामेश्वर और इलातीर्थ के शिवालय में घृष्णेश्वर या घुसृणेश्वर।
इन द्वादश ज्योतिर्लिंगों में वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग के विषय में पाठान्तर मिलता है। 'बृहत्स्तोत्ररत्नाकर' (181 स्तोत्र-संख्या) में द्वादश ज्योतिर्लिंगों की प्रार्थनास्तोत्र के दो प्रकार मिलते हैं। प्रथम प्रकार के स्तोत्र में 'वैद्यनाथ' के बारे में लिखा है :
पूर्वोत्तरे प्रज्वलिकानिधाने
सदा वसन्तं गिरिजासमेतम्।
सुरासुराराधितपादपद्मं
श्रीवैद्यनाथं तमहं नमामि।।
इसमें 'पूर्वोत्तरे प्रज्वलिका निधाने' पाठ से स्पष्ट है कि पूर्वोत्तर भारत के 'प्रज्वलिका-निधान' अर्थात् चिताभूमि में वैद्यनाथ प्रतिष्ठित हैं।
दि्वतीय प्रार्थना-स्त्रोत में पाठ है- 'परल्यां वैद्यनाथं च।' इससे कुछ लोग हैदाराबाद (दक्षिण) के निकट परली ग्राम में प्रतिष्ठित शिवलिंग को वैद्यनार्थ शिवलिंग मानते हैं, किंतु 'शिवपुराण' (अध्याय 38) में द्वादश ज्योतिर्लिंगों के स्थानों का जो निर्देश है, उसमें 'वैद्यनाथं चिताभूमौ' का स्पष्ट उल्लेख है और यह चिताभूमि बिहार (अब झारखण्ड) वैद्यनाथ शिव के क्षेत्र में अवस्थित है। इनके लिंग की, रावण के द्वारा की गई स्थापना की कथा भी प्रर्याप्त मिथकीय होते भी अविश्वसनीय नहीं है। वैद्यनाथ-क्षेत्र में इस पुराण कथा के कई वृत्त-साक्ष्य आज भी विद्यमान हैं। इसलिए वैद्यनाथ शिव को 'रावणेश्वर वैद्यनाथ' भी कहा जाता है।
'लिंग' शब्द का रहस्य और लिंगार्चन :
'लिंग' का साधारण अर्थ चिन्ह या लक्षण है। जैसे : पुलिंग, स्त्रीलिंग। देव चिन्ह के अर्थ में 'लिंग' शब्द शिवलिंग के लिए ही प्रयुक्त है। देव-प्रतिमाओं को 'मूर्ति' कहते हैं। परंतु 'लिंग' में आकार या रूप का उल्लेख नहीं है। यह चिन्ह मात्र है और चिन्ह पुरुष की जननेन्द्रिय जैसा है, जिसे 'लिंग' कहते हैं। परन्तु 'स्कन्दपुराण' में 'लयनात् लिंगमुच्यते' कहा गया है। अर्थात्, लय या प्रलय को 'लिंग' कहते हैं। प्रलयाग्नि में सब कुछ भस्म होकर शिवलिंग में समा जाता है। यहॉं तक कि वेद, शास्त्र आदि भी लिंग में लीन हो जाते हैं। फिर, सृष्टि के आदिकाल में लिंग से ही सब कुछ पुन: प्रकट होते हैं। अत:, 'लय' से 'लिंग' शब्द का उद्भव (लयं गच्छति इति लिंगम्) सही है। यह एक संयोग की बात है कि 'लिंग' शब्द के अनेक अर्थों में लोक-प्रसिद्ध पुरुष-जननेन्द्रिय अर्थ अश्लील है किंतु वैदिक शब्दों का यौगिक अर्थ लेना ही समीचीन माना जाता है। यौगिक अर्थ अथवा व्युत्पत्तिजन्य अर्थ में अश्लीलता नहीं रह जाती। लौकिक अर्थ में जो अश्लील और अनुचित प्रतीत होता है, वही आध्यात्मिक अर्थ में श्लील और समुचित हो जाता है।
इसी प्रकार 'भग' शब्द लौकिक अर्थ में 'स्त्री योनि' के लिए प्रचलित है, किंतु वैदिक और आध्यात्मिक अर्थ में समग्र ऐश्वर्य, समग्र धर्म, समग्र यश, समग्र सम्पत्ति, समग्र ज्ञान और समग्र मोक्ष साधन (वैराग्य आदि) को 'भग' कहा गया है। इन्हीं छह ऐश्वर्यों को धारण करने वाले को 'भगवान' कहते हैं। और फिर भगवान सूर्य का भी एक पर्याय 'भग' है ('इनो भगो धामनिधि:'-अमर-कोष)।
लिंगार्चन में अश्लीलता की कल्पना परम मूढ़ता, घोरतर नास्तिकता और शास्त्र में सर्वथा अनभिज्ञता है। वास्तव में यह स्त्री-पुरुष की जननेन्द्रिय की पूजा नहीं है, बल्कि विश्व-नियन्ता ईश्वर के स्वरूप का चिन्ह है। इसी आदिपुरुष शिव के लिंग और अनादि प्रकृति पार्वती की योनि से समस्त सृष्टि उत्पन्न होती है। योन्याकार अर्घे में प्रतिष्ठित लिंग-रूप शिवकी जो पूजा शिव मंदिरों या घरों में की जाती है, वह वस्तुत: पुरुष और प्रकृति के लिंग और योनि के संयोग (शैव दर्शन में इसे 'कमल-कुलिश योग' कहा गया है) से होने वाली जागतिक सृष्टि का संकेतक है। इसीलिए शिव और पार्वती समस्त संसार के माता-पिता हैं। महाकवि कालिदास ने 'रघुवंश महाकाव्य' के मंगलाचरण में शिव-पार्वती को जगत्पिता और जगन्माता कहा है - 'जगत: पितरौ वन्दे पार्वती-परमेश्वरौ।' माता-पिता के संयोग को यदि अश्लील मान लिया जाए, तो सारी सृष्टि ही अश्लील हो जाएगी। अतएव, इस संदर्भ में अश्लील दृष्टि की संकीर्णता नितरां हेय है। गोस्वामी तुलसीदस ने भी माता-पिता की कामचेष्टा को वर्णन के विरुद्ध बताया है।
जगत मातु पितु संभु भवानी।
तेहिं सिंगारु न कहउँ बखानी।।
(बालखण्ड : 103-2)
पार्थिव-पूजा और जलाभिषेक :
भारतवर्ष में ज्योतिर्मय शिवलिंग की पार्थिव-पूजा और पाषण-पूजा विशेष प्रचलित है मिट्टी के बने लिंग की अभिषेक-पूजा को 'पार्थिव-पूजा' कहते हैं और पाषाण-निर्मित लिंग की पूजा 'पाषाण-पूजा' कही जाती है। हिमालच-क्षेत्र में तो अमरनार्थ शिव के हिमलिंग का पूजन होता है। बिहार के भागलपुर जिले में स्थित प्राचीन 'गोनूधाम' के शिव-मंदिर में गंगा की मृत्तिका के लिंग की पूजा होती है। इस मृण्मय लिंग पर अर्पित जल को पीने से सर्पदंश से विष-मूर्च्छित लोग जी उठते हैं। यह विषपाणी शिव के मृत्युंजय रूप की प्रत्यक्ष महिमा है।
मुजफ्फरपुर क्षेत्र में शिव की पार्थिव-पूजा में एक लाख शिवलिंग गंगा की मिट्टी से बनाये जाते हैं और पर्याप्त ऋद्धि-समृद्धि के साथ उनका पूजन होता है। इसे 'लखवर' ('लक्षावली') पूजा कहा जाता है।
सामान्यतया, शिव को जलाभिषेक-पूजा अतिशय प्रिय है। वह जलाभिषेक के इतने प्रेमी हैं कि उन्होंने साक्षात् अपनी प्रेयसी गंगा को अपने जटाजाल में रख लिया है, ताकि गंगा उनका निरन्तर जलाभिषेक करती रहें। शिव के ज्योतिर्लिंग का अभिषेक 'रुद्राध्याय' के वैदिक मन्त्रों के पाठ से किया जाता है। इसमें शिव की संस्तुति से सम्बद्ध वेदमंत्रों की रचना एकादश अनवाकों (अध्यायों) में की गई है। ये मन्त्र बहुत ही शक्तिशाली और भगवान रुद्र के लिए अतिशय प्रीतिकर हैं। 'मेरुतन्त्र' में रुद्रपाठ के तीन भेद कहे गए हैं- अघुरुद्र, महारुद्र और अतिरुद्र। शिव के ज्येातिर्लिंग का अभिषेक प्राय: लघु रुद्र विधि से सम्पन्न होता है। जो शिवभक्त लघु रुद्र विधि से लिंगाभिषेक करता है। जलाभिषेक का शिव-स्तुतिपरक पहला मन्त्र है :
ओं नमस्ते रुद्र मन्यव उतो त इषवे नम:।
बाहभ्यामुत ते नम:।। (रुद्राध्याय)
ज्योतिर्लिंग का पूर्ण अभिेषेक एक लाख मन्त्रों द्वारा होता है।
यह आपबीती तो जग के लिए बहुत उपयोगी है!
ReplyDeleteआपकी पहली ही पोस्ट ने कमाल कर दिया । ज्ञानवर्धक जानकारी के लिये आभार ।
ReplyDeleteरोचक और ज्ञानवर्धक जानकारी ...आभार ..!!
ReplyDeleteप्रिय भाई चंद्रकांत, बहुत अच्छा लगा. मैने भग और लिंग के निहितार्थ को समझने की बडी कोशिश की. बृह्दारण्यक में वैश्वानर की कल्पना की गयी है. वह विश्व नर है अर्थात ऐसा नर जिसके शरीर में सारे प्राणी समाहित हैं. सभी लिंग भी. इस तरह उसके भीतर ही कोटि-कोटि लिंग और भग हैं. इसी अर्थ में वह भगवान है और लिंग रूप भी. भगवान होकर वह विष्णु है और लिंग रूप में शिव. चूंकि सारे भग, लिंग़ उसी में हैं, इसलिये रचना उसी की इच्छा से हो रही है, वह स्वयं ही स्वयं से सम्भोग करता है. इस काल में वह ब्रह्मा होता है. ये तीनों एक ही शक्ति के अलग-अलग रूप हैं, बल्कि कार्य के अनुसार नाम बदल जाता है.
ReplyDeleteInformative....
ReplyDeleteचंद्रकांत जी ,आप की व्याख्या सटीक और वैज्ञानिक है बधाई.m 09818032913
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